झूठी मोहब्बत

दलित पैंथर ने कैसे बदली जाति को लेकर आरएसएस की रणनीति

इलस्ट्रेशन अनन्या गुप्ता
इलस्ट्रेशन अनन्या गुप्ता

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जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुख्यालय नागपुर में एम एस गोलवलकर की मौत हुई, तो शहर के कुछ हिस्सों में कुछ अप्रत्याशित जश्न मनाया गया. 5 जून, 1973 की शाम को, लगभग 100 लोग शहर के इंदोरा चौक के पास इकट्ठा हुए. भीड़ में मौजूद सरोज मेश्राम ने मुझे बताया, 'वह उमस भरी रात थी, लेकिन हमारा जोश कम न हुआ.' तब 17 साल के मेश्राम दलित पैंथर्स के नागपुर चैप्टर का हिस्सा थे. इस जाति-विरोधी क्रांतिकारी समूह को 1972 में बॉम्बे में दलित कवियों और कार्यकर्ताओं ने अमेरिका के ब्लैक पैंथर्स की तर्ज़ पर बनाया था. प्रकाश रामटेके, भीमराव नाइक, बब्बन कटाने, सुरेश वाघमारे और सुरेश घाटे समेत स्थानीय नेताओं ने शहर के बीचों-बीच से होते हुए महल इलाके में स्थित आरएसएस मुख्यालय तक मार्च करने का फ़ैसला किया.

मेश्राम अब 70 साल के हैं. उन्होंने कहा, 'हम किसी की मौत का जश्न नहीं मनाते, लेकिन गोलवलकर की बात अलग थी. वह चातुर्वर्ण्य के सबसे बड़े समर्थक थे और उनकी मौत की ख़बर सुनकर हम अपनी खुशी रोक नहीं पाए.' उन्होंने बताया कि कुछ सदस्यों ने इस मौके पर मिठाइयां भी बांटीं. मेश्राम ने कहा, 'हम नारे लगा रहे थे, ‘आरएसएस मुर्दाबाद! गोलवलकर मुर्दाबाद! ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद!’ कुछ देर तक हम संघ मुख्यालय के बाहर खड़े होकर नारे लगाते रहे, लेकिन कोई बाहर नहीं निकला.' पैंथर्स आगे बढ़कर लगभग एक किलोमीटर दूर रेशीमबाग़ में स्थित आरएसएस के दूसरे दफ़्तर गए और वहां भी नारेबाजी की.

80 साल से अधिक के सुरेश घाटे ने मुझे बताया कि यह एक ऐसा अनुभव था जिसे वह कभी नहीं भूल सकते. उन्होंने कहा, 'स्थापना के एक साल के अंदर ही दलित पैंथर्स इतने आक्रामक हो गए थे कि आरएसएस दफ़्तर से बाहर निकलकर हमारा सामना करने की हिम्मत किसी में भी नहीं थी. यहां तक कि पुलिस ने भी हमें रोकने की हिम्मत नहीं की.'

मेश्राम ने उस मार्च को शांतिपूर्ण बताया. उन्होंने कहा, 'किसी भी पैंथर ने हिंसा करने का कोई संकेत नहीं दिया. उस समय सवाल अपना गुस्सा ज़ाहिर करने का नहीं था, बल्कि यह संदेश देने का था कि बाबासाहेब के अनुयायी होने के नाते, हम जाति व्यवस्था का समर्थन करने वाले किसी भी व्यक्ति का कड़ा विरोध करते हैं.'

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