ऑपरेशन ब्लू स्टार के 35 साल : कांग्रेस की नीति और भिंडरांवाले का उदय

08 June 2019
अकाली दल के गुरुचरण सिंह तोहरा (बाएं), जरनैल सिंह भिंडरावाले (दाएं) के साथ.
सतपाल डेनिश
अकाली दल के गुरुचरण सिंह तोहरा (बाएं), जरनैल सिंह भिंडरावाले (दाएं) के साथ.
सतपाल डेनिश

करीब 35 साल पहले भारतीय सेना ने अमृतसर के दरबार साहिब में ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया था जिसका मकसद कट्टरपंथी दमदमी टकसाल के 14वें प्रमुख भिंडरांवाला और उनके ​हथियारबंद समर्थकों को काबू में करना था जो दरबार साहिब परिसर से समानांतर सरकार चला रहे थे. हालांकि यह ऑपरेशनतत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आदेश के तहत किया गया था लेकिन भिंडरांवाले के उदय के लिए कांग्रेस पार्टी ही जिम्मेदार थी.

नीचे प्रस्तुत है कारवां के राजनीतिक संपादक हरतोष सिंह बल की मई 2014 में प्रकाशित स्टोरी का अंश जिसमें भिंडरांवाला के उदय और कांग्रेस की दोहरी नीति का चित्रण है. हरतोष बताते हैं कि पंजाब के बाहर के “जिन पत्रकारों को भिंडरांवाले जाहिल जैसे लगते थे, वे यह बात भूल गए कि उनकी तीखी जुबान और कड़े फैसले किसान जाटों को आकर्षित करते थे.”

जरनैल सिंह का जन्म 1947 में फरीदकोट जिले के रोद गांव में हुआ था. वह एक बराड़ जाट परिवार था जो पुराने समय से ही टकसाल से जुड़ा हुआ था. राम सिंह की पृष्ठभूमि भी जरनैल सिंह जैसी ही थी. यह कोई इत्तेफाक नहीं था. हरित क्रांति ने पंजाब के ग्रामीण इलाकों को खुशहाल तो बना दिया था लेकिन इसने जाट सिखों में गैरबराबरी को भी बढ़ा दिया था. जाट सिख समुदाय पंजाब का जमींदार तबका है लेकिन जमीन की गैरबराबरी ने इसमें ऊंच-नीच की लकीर पैदा कर दी. भिंडरांवाले और राम सिंह ऐसे परिवारों से आते थे जिनके लिए दो जून की रोटी का इंतजाम करना कठिन काम था. (भिंडरांवाले की मौत के बाद, बंदूक उठाने वाले पंजाब के नौजवानों में अधिकांश ऐसे ही थे.)

परंपरागत रूप से दमदमी टकसाल का संबंध सिखों के 10वें गुरु, गुरु गोविंद सिंह से है. गोविंद सिंह ने दमदमा साहिब गुरुद्वारा में रहते हुए गुरु ग्रंथ साहिब को किताब का रूप दिया और सिखों के एक समूह को गुरु ग्रंथ साहिब पढ़ने की सही विधि और समझ की शिक्षा दी थी. बाद में चलकर टकसाल की छवि सिख धर्म की शास्त्रीय (कट्टर) मान्यता को समर्थन करने वाली बनी. हाल के सालों में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (एसजीपीसी) ने कई महाविद्यालयों की स्थापना की है. लेकिन इसके पहले प्रमुख गुरुद्वारों के जाठेदार और रागी इसी टकसाल से बुलाए जाते थे. इसी वजह से गरीब परिवारों के बहुत से नौजवानों को टकसाल में भर्ती होने की प्रेरणा मिली. इन नौजवानों को कठिन प्रशिक्षण दिया जाता. राम सिंह बताते हैं, “सबसे पहले हमें गुरु ग्रंथ साहिब को पढ़ने का सही तरीका सिखाया जाता, हर शब्द और दोहे का मतलब याद करना पड़ता. इसके बाद ही हम वेदांत का अध्ययन करते थे. इस पढ़ाई में 7 से 10 साल लग जाते थे.”

जिस साल राम सिंह ने टकसाल में दाखिला लिया था, जरनैल सिंह उसके पार्ट-टाइम रेसिडेंट बन चुके थे. गुरुबचन सिंह चाहते थे कि जरनैल सिंह घर लौट जाएं और शादी कर घर बसा लें. इस कारण जरनैल सिंह घर लौट आए और 1966 में शादी कर जमीन के छोटे से हिस्से में किसानी करने लगे.

Hartosh Singh Bal is the political editor at The Caravan.

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