शूद्र कहां हैं?

आज के भारत में लापता शूद्र

09 November 2018
जिशान ए लतीफ/कारवां

1990 के दशक की शुरुआत में जब सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया तो वह पल शूद्रों के लिए एक ऐतिहासिक क्षण था. इस कदम ने सरकारी नौकरियों और सरकारी उच्च शिक्षा में अन्य पिछड़ी जातियों – एक श्रेणी जिसमे अधिकतर पारंपरिक रूप से मजदूरी और कारीगरी करने वाली शूद्र जातियां सम्मिलित थीं – के लिए आरक्षण लागू कर दिया. आयोग ने भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था में सबसे दयनीय मानी जाने वाली श्रेणी के रूप में इन चौथी और सबसे निचली जातियों की पहचान की थी. श्रेष्ठतर समझी जाने वाली जातियों के बरअक्स वे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक दृष्टि से बहुत पिछड़े हुए थे फिर भी उन्हें सकारात्मक पक्षपात की नीति, जिसे आजादी के बाद दलितों और आदिवासियों (अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां) के लिए अपनाया गया था, से बाहर रखा गया था. आयोग ने ऐतिहासिक पिछड़ेपन के आधार पर अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की एक अलग श्रेणी तैयार की. ब्राह्मण और वैश्य जातियों, यहां तक कि शूद्रों के एक तबके ने भी, इस कदम का कड़ा विरोध किया. अपेक्षाकृत रूप से अंत: शूद्र जातियों के शिखर पर आसीन संपन्न जमींदार समूहों जैसे कम्मा, रेड्डी, कापू, गौड़ा, नायर, जाट, पटेल, मराठा, गुज्जर, यादव, इत्यादि जातियां दशकों से खुद ब्राह्मण-बनिया जातियों की आदतों और पूर्वाग्रहों को अपनाने में लगीं थीं. 1996 में प्रकाशित अपनी पुस्तक, मैं हिंदू क्यों नहीं हूं, में मैंने इन ‘उच्च’ शूद्र जातियों का वर्णन नव-क्षत्रियों के रूप में किया था. ये समूह इस भरोसे खुद का संस्कृतिकरण कर रहे थे कि वर्ण व्यवस्था में पारंपरिक रूप से दूसरे स्थान पर आसीन और लगातार क्षय होते, क्षत्रियों का स्थान ले पाएंगे.    

मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू हुए ढाई दशक बीत चुके हैं. एक पूरी पीढ़ी बड़ी हो चुकी है. यह वक़्त है पूछने का कि आरक्षण इन शूद्र अन्य पिछड़ी जातियों को कितनी दूर तक लेकर आया है? उच्च शूद्र जातियों, जिन्होंने इस आरक्षण का विरोध किया, का क्या भला हुआ? आज शूद्र भारत में खुद को कहां पाते हैं? भारत की कुल जनसंख्या में शूद्रों की तादाद तकरीबन आधी है – एक ऐसा देश जो जनसंख्या के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर पर है. अस्सी के दशक में, मंडल आयोग इस नतीजे पर पहुंचा कि भारत में अन्य पिछड़ी जातियों की तादाद, जिसमे उच्च शूद्र जातियां शामिल नहीं हैं, 52 प्रतिशत है. आज की तारीख में यह संख्या 65 करोड़ से अधिक बैठती है, जो अमरीका की जनसंख्या से दोगुना और पाकिस्तान या ब्राजील से तीन गुना है. जबकि अगड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को मिलाकर भी यह कुल जनसंख्या का 20 प्रतिशत से ज्यादा नहीं बैठता.

इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद भी, शूद्रों का प्रतिनिधित्व राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में, चाहे वह सरकार, निजी व्यवसायों, धर्म और शिक्षा में, पर्याप्त नहीं था. राष्ट्रीय स्तर पर तो विशेषतौर पर वे ब्राह्मणों और वैश्यों, खासकर, वैश्यों के अधीन थे. यही बात उच्च शूद्रों के ऊपर भी लागू होती है, जो आज अजीबोगरीब स्थिति में हैं. अन्य पिछड़ी जातियों की सूची में उनका नाम शामिल न किए जाने की वजह रही है उनके द्वारा इस बात पर जोर देना कि उनका अन्य शूद्रों से उच्चतर रूतबा है. इस वक्त लाखों-लाख लोग पूरे देश भर में अवसरों की गतिशीलता में गतिरोध की वजह से गुस्से में हैं और मांग कर रहे हैं कि उन्हें भी अन्य पिछड़ी जातियों की सूची में शामिल किया जाए ताकि वे भी आरक्षण का लाभ उठा सकें.

1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने के लिए संघर्ष करते शूद्र ओबीसी. आज “उच्च” शूद्र, जिन्होंने पहले ओबीसी आरक्षण का विरोध किया था, स्वयं को ओबीसी सूची में डाले जाने की मांग कर रहे हैं.
बीसीसीएल

राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में शूद्र कहां हैं? उनमे सबसे अमीर भी कृषि अर्थव्यवस्था पर निर्भर हैं, जो पारंपरिक रूप से उनकी आय का प्रमुख साधन रहा है. उद्योग और वित्त के क्षेत्र में उन्होने कोई खास तरक्की नहीं की है. इस क्षेत्र पर बनियों का दबदबा रहा है. पूंजी के लिए शूद्रों को उन पर ही हमेशा की तरह निर्भर रहना पड़ता है. व्यवसाय के क्षेत्र में एक भी ऐसा शूद्र परिवार नहीं है जो अंबानियों, अडानियों या मित्तल को चुनौती देता हो. गरीब शूद्र आज भी खेतों, निर्माण स्थलों और फैक्ट्रियों में काम करते हैं जहां रोज नए शूद्र कारीगर शामिल हो रहे हैं क्योंकि आधुनिक उद्योग के जमाने में उनके परंपरागत कौशल का लगातार अवमूल्यन हुआ है. राष्ट्रीय चेतना और संस्कृति में शूद्र  कहां बसते हैं? समकालीन भारत में बौद्धिक, दार्शनिक और सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में उनका कोई खास योगदान नहीं रहा है. औरतों की तो रहने ही दीजिए, किसी भी शूद्र मर्द को हिंदू धर्म में किसी भी प्रभावशाली पद पर नहीं आने दिया गया है, हालांकि हर कहीं शूद्रों पर हिंदू धर्म को आक्रमकता के साथ थोपा गया है. भारत के हिंदुओं में सबसे अधिक शूद्रों की संख्या है, लेकिन धर्म के मामलों में उनके मत को तरजीह नहीं दी जाती. खुद शूद्रों में जाति-आधारित पाबंदी इस कदर घर कर गई है कि कोई भी शूद्र पुरोहित बनने की सोचता भी नहीं है. इसके अलावा विरले ही ऐसा कोई शूद्र बुद्धिजीवी होगा, जो उनसे भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे में उनके समूह के सामाजिक और राजनीतिक स्थान पर बात कर सके. हद से हद ऐसी शख्सियतें, प्रादेशिक स्तर पर मौजूद हैं और अपनी-अपनी भाषाओं में उनसे संवाद करती हैं लेकिन राष्ट्रीय बहस में वे कभी शरीक नहीं हो पातीं. अकादमिक दुनिया और मीडिया ने भी शूद्र दिमागों को अपने यहां जगह नहीं दी.

Kancha Ilaiah Shepherd is a social scientist, academic and writer. He is the author of books such as Why I Am Not A Hindu and Post-Hindu India.

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