रिलायंस शिपयार्ड ने तीन सालों से नहीं किया वेंडरों का भुगतान

20 November 2018
जब से पीपावाव डिफेंस एंड ऑफशोर इंजीनियरिंग लिमिटेड का अधिग्रहण रिलायंस ने किया है, तब से वेंडरों का भुगतात या तो सीमित कर दिया गया या उसे पूरी तरह से रोक दिया गया.
पीटीआई

गुजरात के अमरेली जिले के राजुला शहर में रिलायंस के एक शिपयार्ड में काम करने वाले लगभग 200 वेंडरों को कंपनी ने वर्ष 2015 से भुगतान नहीं किया है. उस वर्ष अनिल अंबानी के रिलायंस समूह ने देश की सबसे बड़ी पोत निर्माण कंपनी पीपावाव डिफेंस एंड ऑफशोर इंजीनियरिंग लिमिटेड को खरीदा था. बिकवाली के वक्त पीपावाव दिवालिया होने के कगार पर थी और उसके ऊपर 6000 करोड़ रुपए का कर्ज था. कंपनी के बिकने के बाद उसका सारा कर्ज भी रिलायंस के जिम्मे आ गया. राजुला से कांग्रेस के विधायक अंबरीश डेर की एक सूची के अनुसार सितंबर 2018 तक रिलायंस के ऊपर 191 वेंडरों का कुल 71 करोड़ 79 लाख रुपए बकाया है.

मेरी बातचीत में कई वेंडरों ने बताया कि शुरू में रिलायंस द्वारा पीपावाव को खरीदने की खबर से वे लोग खुश हुए थे. उन्होंने कहा कि 2012 तक भुगतान में कमी होने लगी थी लेकिन पीपावाव के संस्थापक-प्रमोटर निखिल गांधी और भावेश गांधी उन लोगों को बकाया का कुछ हिस्सा देते रहते थे. रिलायंस के अधिग्रहण करने के बाद वेंडरों का भुगतात या तो सीमित कर दिया गया या उसे पूरी तरह से ही रोक दिया गया. इसके तीन साल बाद कई बैंकों ने रिलायंस नेवल एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड (आरनेवल) के खिलाफ कर्ज उगाही कार्यवाही आरंभ की. वेंडर दावा कर रहे हैं कि रिलायंस पर उन लोगों की बहुत बड़ी रकम बकाया है.

इन वेंडरों में वे बिक्रेता और ठेकेदार हैं जो शिपयार्ड में काम के लिए केबल तार और बिजली के पैनल आदि की आपूर्ति करते हैं एवं यार्ड में काम के लिए मजदूर उपलब्ध कराते हैं. बजरंग कंस्ट्रक्शन के शिवा भाई वाघ ने बताया कि 2008 से उनकी कंपनी फैबरिकेशन का काम ले रही है. वो बताते हैं कि “2012 से भुगतान कम होने लगा था.” उन्होंने आगे कहा, “जब से रिलायंस आया ना, अनिल अंबानी, तब से तो वाट ही लग गई.” डेर की सूची के अनुसार रिलायंस पर वाघ कंपनी का 72 लाख रुपए बकाया है.

साल 2015 से रिलायंस समूह रक्षा क्षेत्र में व्याप्त व्यवसायिक अवसरों में तेजी के साथ  फैल कर रहा है. उस साल मार्च में रिलायंस समूह ने घोषणा की कि छह महीनों के भीतर वह पीपावाव शिपयार्ड का अधिग्रहण कर लेगी. जनवरी 2016 के शुरू में ही टेकओवर पूरा कर लिया गया. लेकिन राजुला में रिलायंस शिपयार्ड का मामला अंबानी के रक्षा व्यवसाय के खस्ता हाल को उजागर करता है. सार्वजनिक और निजी आश्वासनों के बावजूद स्थानीय ठेकेदारों पर बकाया करोड़ो रुपए का उधार चुकता नहीं हो पाया है. अनिल अंबानी का समूह शिपयार्ड को चलाए रखने के लिए संघर्षरत है.

जिन वेंडरों से मैंने बात की उनमें से अधिकांश ने अंबानी के किए वादे की बात बताई. हालांकि टेकओवर जनवरी 2016 में पूरा हुआ लेकिन सितंबर 2015 में ही, जैसा कि भावेश लखानी बताते हैं, अंबानी ने 2000 मजदूरों को संबोधित करते हुए कहा था, “हमारे पास पैसों की कोई कमी नहीं है और प्रत्येक व्यक्ति को उसका पूरा बकाया चुकाया जाएगा.” वो जोर देकर कहते हैं, “अनिल भाई ने खुद बोला था”. लखानी शिपिंग कंपनी आदित्य मैरीन के मालिक हैं जिसका 60 लाख रुपया रिलायंस पर बकाया है.

Sagar is a staff writer at The Caravan.

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