किसान का सवाल अर्थतंत्र ही नहीं हमारी नैतिकता पर भी बड़ा प्रश्नचिन्ह है

28 November 2018
भारत तिवारी
भारत तिवारी

29 और 30 नवंबर को देशभर के किसान दिल्ली में जमा हो कर संसद तक मार्च करेंगे और कृषि संकट के सवाल पर तीन सप्ताह का विशेष संयुक्त संसदीय सत्र बुलाने की मांग करेंगे. किसान मुक्ति मार्च नाम के जुलूस का आयोजन अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति कर रही है. जून 2018 में गठित यह समिति 130 किसान संगठनों का फोरम है. इस दो दिवसीय आयोजन में एक लाख से अधिक किसानों के अलावा मिडिल क्लास की भागीदारी की आशा है.

दशकों से भारतीय किसान कर्ज, सूखा और अत्महत्या की मार झेल रहा है. 2004 में सरकार ने एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया था. 2004 और 2006 के बीच आयोग ने छह रिपोर्ट जमा की लेकिन किसी को भी लागू नहीं किया गया.

हाल के वर्षों में किसानों ने एक होकर विरोध जताना आरंभ किया है. इस साल मार्च के महीने में किसानों ने नासिक से मुंबई तक की 182 किलोमीटर की पैदल यात्रा की. इसी को आगे ले जाते हुए किसान मुक्ति मार्च का लक्ष्य भारतीय किसानों की चिंताओं से नीति निर्माताओं को अवगत कराना है.

किसान मार्च के पहले दी कारवां की रिपोर्टिंग ​फेलो आतिरा कोनिक्कराने पीपुल्स आर्काइव फॉर रूरल इंडिया के संस्थापक संपादक पी. साईनाथ से बात की और किसानों के इस नए तेवर और उसे प्राप्त हो रहे मिडिल क्लास के समर्थन के बारे में जानना चाहा.

आतिरा कोनिक्करा: क्या आप को लगता है कि महाराष्ट्र में हुए बड़े किसान मार्च (जुलूस) ने किसानों को संसद मार्च को प्रेरणा दी?

Aathira Konikkara is a reporting fellow at The Caravan.

Keywords: P Sainath agrarian crisis agriculture farmer suicides in India Farmer Suicides Kisan Long March Farmers' Agitation Swaminathan Commission minimum support price Parliament Kisan Mukti March All India Kisan Sangharsh Coordination Committee
COMMENT